Bhagwat Navneet ( Sant Sri Ram Chandra Keshav Dongre Ji Maharaj )

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2009  Bhagwat Navneet ( Sant Sri Ram Chandra Keshav Dongre Ji Maharaj ) by Gita Press, Gorakhpur

संत श्री राम चन्द्र केशव डोंगरे जी महाराज की भागवत कथाओं तथा वचनों का संग्रह |

 

2009  Bhagwat Navneet ( Sant Sri Ram Chandra Keshav Dongre Ji Maharaj ) by Gita Press, Gorakhpur

श्रीमद्भागवत एक जीवन दर्शन है। यह मानव जीवन का एक अनुपम, उत्कृष्ट एवं आदर्श मार्गदर्शक है। इसमें जीवन के प्रश्नों के उत्तर हैं, जीवन एवं जगत्‌ की समस्याओं के समाधान हैं और सफल, सार्थक, समृद्ध एवं शान्तिपूर्ण जीवन जीने के व्यावहारिक सूत्र हैं। जीवन में समग्र सफलता एवं शान्ति का समन्वय केवल आध्यात्मिक विचारों एवं चिन्तन से ही सम्भव हो सकता है। जीवन में लौकिक सफलता एवं समृद्धि तथा मन की शान्ति प्राप्त होती रहे और हमारा जीवन पूर्णतः सार्थक बने, इसके लिये हमें समुचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। ऐसा मार्गदर्शन सच्चे सन्त-महात्मा ही प्राप्त हो सकता है। सात्त्विक महापुरुष से ही प्राप्त हो सकता है।

सामान्यतः श्रीमद्भागवत की कथा विद्वानों एवं व्यासों द्वारा प्राचीन काल से होती रही है, परंतु वर्तमान समय में कथावाचक के रूप में गोलोकवासी सन्त श्रीरामचन्द्र केशव डोंगरेजी महाराज (१९२५ १९९० ई.) का नाम अतीव श्रद्धा और हार्दिक निष्ठा के साथ स्मरण किया जाता है, कारण इनके द्वारा कथा सत्र का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। श्रीडोंगरेजी महाराज की कथा की कुछ विशेषता थी। उनके कथा सत्रों में हजारों-लाखों श्रोता कथा-उपवन में समाधिका दिव्यानन्द अनुभव करते थे। सादगी, सौम्यता, दृढ़ आत्मानुशासन और अटूट भगवन्निष्ठा से ओत-प्रोत पूज्य श्रीडोंगरेजी महाराज का आभामण्डल ऐसा अलौकिक था कि बरबस ही लोगों को अपने आकर्षण में आबद्ध कर लेता था। इनकी कथा दस दिन, ग्यारह दिन अथवा कभी-कभी पन्द्रह दिन की भी होती थी। कथा प्रायः प्रातः सायं दो सत्र में सात-आठ घण्टे तक चलती थी। लाखों-हजारों के समूह में भी शान्त वातावरण रहता था। ऐसा लगता था, वक्ता के साथ श्रोता भी समाधिस्थ हैं। व्यास गद्दी पर विराजमान होने के बाद कथा के अतिरिक्त वे अन्य किसी बात पर एक शब्द भी नहीं बोलते, इसके साथ ही व्यास गद्दी की अन्य मर्यादाओं का भी ध्यान रखते। इनकी कथा शैली अत्यन्त सहज-सरल होते हुए भी उसमें वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को सरलता के साथ सामान्य जनों की बुद्धि में स्थापित करने का अद्भुत और दैवीय प्रभाव विद्यमान था जन्म से मृत्यु पर्यन्त तथा प्रातः जागरण से रात्रि-शयन पर्यन्त जीवन की सम्पूर्ण विधाओं पर वे प्रकाश डालते। मानव को क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये एवं अपने कल्याण के लिये उसे किस रूप में रहना चाहिये-  श्रीमद्भागवत कथा के माध्यमसे इन सारी बातोंपर वे प्रकाश डालते। उनकी कथा का इतना प्रभाव था कि कथा सुनकर श्रोता के स्वभाव में परिवर्तन होता और हृदय में सात्त्विक वृत्तियाँ जाग्रत हो जातीं।

एक बार अयोध्या में कनक भवन के प्रांगण में सन्त डोंगरेजी महाराज की कथा चल रही थी। कथा में एक गुजराती सज्जन बैठे थे। प्रसंगवश उन्होंने मुझे बताया कि पहले मैं प्रतिदिन ५० पान खाता था, १०० सिगरेट पीता था, महीने में कम-से-कम १० दिन सिनेमा देखता था। होटल में जाकर चाय-जलपान करता था। अब मेरा नियम है कि डोंगरेजी महाराज की कथा जहाँ भी तीर्थस्थल में होती है, वहाँ जाकर मैं इनकी कथा सुनता हूँ और प्रत्येक कथा में मैंने अपनी एक-एक आदत को छोड़नेका संकल्प कर रखा है। आज मैं न पान खाता हूँ, न सिगरेट पीता हूँ, न सिनेमा देखता हूँ और न होटलों में ठहरता हूँ। कथा सुनकर मेरे जीवन में ये परिवर्तन आये। इस प्रकार के कई चमत्कारपूर्ण उदाहरण डोंगरेजी महाराज को कथा में प्राप्त होते थे। पूर्व के दिनों में भी डोंगरेजी महाराज मराठी मिश्रित गुजराती भाषा में ही कथा करते थे।

ये दोनों भाषाएँ उनकी मातृभाषा की तरह थीं। इनमें उनके भाव-विचारों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति सहज सम्भव हो पाती थी। कथा के प्रभाव से उनकी कीर्ति का विस्तार होने लगा और महाराष्ट्र, गुजरात के बाहरसे भी उन्हें कथा. के निमित्त आग्रह और आमन्त्रण प्राप्त होने लगे, किंतु भाषा की अनभिज्ञता के कारण अनेक श्रोता इस कथा मृत से अतृप्त रह जाते थे। उनसे जब हिन्दी में कथा करने का आग्रह किया जाता तो वे कहते कि हिन्दी में कथा करने पर उन्हें भाषा याद रखनी पड़ेगी। भगवान् याद नहीं रह पायेंगे, परंतु अन्ततोगत्या उन्हें हिन्दी में कथा प्रारम्भ करनी पड़ी। महाराज श्री ने बताया कि मेरे पास एक सहस्त्र पत्र आये कि आपके हिन्दी में कथा न करने के कारण हम सबको कथामृत से वंचित रहना पड़ता है। मैं चिन्तित हुआ, मैंने विचार किया कि भगवान्‌ के सहस्त्र मुख हैं, उनकी आज्ञा हो रही है, पर यह कैसे सम्भव होगा। उसी समय परमात्मप्रभु ने मुझे प्रेरणा की- ‘गुजराती तुम्हें किसने सिखायी ?’ मैंने कहा-‘आपने ही सिखायी।’ इसपर उन्होंने कहा- ‘जिसने तुम्हें गुजराती सिखायी, वही तुम्हें हिन्दी भी सिखायेगा। अतः हिन्दीमें कथा करो।’

भगवदाज्ञा से हिन्दीमें कथा प्रारम्भ हो गयी। डोंगरेजी महाराज की हिन्दी बड़ी सरल, सहज और लालित्यपूर्ण थी। स्वाभाविक रूप में हिन्दी भाषी सत्संग प्रेमियों को कथारस के तृप्तिदायक आनन्द का अनुभव होने लगा। काशी, कानपुर, मथुरा, वृन्दावन आदि कई नगरों में कई बार इनकी कथा हुई। अपनी कथा को ये प्रायः टेप नहीं करने देते। इनकी यह मान्यता थी कि कथाव्यास के श्रीमुखसे सुनी कथा ही पुण्य फलदायक होती है। पर एक बार किसी प्रकार कथा टेप करने की अनुमति उनसे प्राप्त कर ली गयी। व्रजवासी ‘प्रेमी मथुरिया’ भी इनकी कथा के रसिक श्रोता थे, उन्होंने परिश्रमपूर्वक सन्त डोंगरेजीकी वाणी को टेप से ज्यों का त्यों अविकल रूप से लिपिबद्ध कर दिया। उसे यथावत् उच्चरित शब्दों में प्रस्तुत किया गया। कथा प्रवाह और उसकी हृदयस्पर्शी प्रभावोत्पादकता को अक्षुण्ण बनाये रखने का प्रयास किया गया है। इतना सब प्रयास केवल इसलिये किया गया है कि इस ‘भागवत नवनीत’ ग्रन्थको पढ़ते समय पाठकों को सन्त श्रीडोंगरेजी महाराज की कथा का दिव्य आनन्द ठीक वैसा ही अनुभव हो, जैसा उनके कथा-सत्रों में होता था।

 

Brand

Geetapress Gorakhpur

Weight 1164 g
Dimensions 27.5 × 19 × 3 cm

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