Bhagwan Surya ( Lord Sun)

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868 Bhagwan Surya ( Lord Sun)) in Hindi with pictures by Gita Press Gorakhpur.

प्रस्तुत पुस्तक-भगवान् सूर्य। इसमें बारह आदित्यों के चित्ताकर्षक चित्र के साथ-साथ प्रत्येक मास के सूर्य का ध्यान, वर्ण, आयुध, व्रत-उपासना तथा लीला-कथा का सरस चित्रण है। धर्मप्राण जिज्ञासुओंके लिये इस पुस्तक में शास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। यह निश्चय ही भगवान् सूर्य के बहुआयामी स्वरूप के सम्बन्ध विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायेगा जो नयी होनेके साथ-साथ उपयोगी भी सिद्ध होगी।

 

Description

उदये ब्रह्मणो रूपं मध्याह्ने तु महेश्वरः। अस्तकाले स्वयं विष्णुस्त्रिमूर्तिश्च दिवाकरः ॥

रात्रि की बड़ी बहन, आकाश की बेटी, वरुण की भगिनी, स्वर्ग की दुहिता उपा सुन्दरी एक युवती की भाँति प्रकाशमय नित्य नवीन परिधान पहने हुए सारे प्राणि समूह को जगाती है। पैरवालॉ को अपने-अपने काम पर भेजती है तथा पर वाले पक्षियों को आकाशमें विचरण करने के लिये प्रेरित करती है। वह अपने आराध्य भगवान् सूर्य का मार्ग प्रशस्त करती है। ऋषिगण इसी काल में अपनी मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ते हैं।

एक ऋषि उषा से प्रार्थना करता है कि यदि आप हमें परमात्माका दर्शन न करा सकी तो भला दूसरा कौन करा सकता है?’

सुदूर क्षितिज पर विराजमान-सविता भगवान्की स्वर्णिम छटा किसके मन को आह्वादित नहीं करती! भगवान् सविता का बालरूप-अरुणोदयकाल ऐसा प्रतीत होता है मानो पूर्व दिशा की गोद में स्थित मार्तण्डशिशु अपनी मधुर मुसकान से सारे संसार को मुग्ध करता हुआ किरणों के बहाने से पृथ्वी पर चलने अर्थात् चराचर जगत्को कार्य करने की प्रेरणा दे रहा हो।

जगत्की समस्त घटनाएँ तो सूर्यदेवका ही लीला-विलास हैं। एक ओर जहाँ भगवान् सूर्य अपनी कर्म सृष्टि-रचना की लीला से प्रातःकाल में जगत्को संजीवनी प्रदानकर प्रफुल्लित करते हैं तो वहीं दूसरी ओर मध्याह्नकाल में स्वयं ही अपने महेश्वर-स्वरूप से तमोगुणी लीला करते हैं। मध्याह्वकाल में आप अपनी ही प्रचण्ड रश्मियों के द्वारा शिवरूप से सम्पूर्ण दैनिक कर्म-सृष्टि की रजोगुण रूपी कालिमा का शोषण करते हैं। जिस प्रकार परमात्मा अपनी ही बनायी सृष्टि का आवश्यकतानुसार यथा समय अपने में ही विलय करता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् आदित्य मध्याह्न काल में अपनी ही रश्मियों द्वारा महेश्वररूप से सृष्टि के दैनिक विकारों को शोषित कर कर्म-जगत्को हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ और नीरोग बनाते हैं। किं बहुना जगत्-कल्याण के लिये भगवान् सूर्य की यह दैनिक विकार-शोषण की लीला ही भगवान् नीलकण्ठ के हलाहल-पान का प्रतीक है। दिनभर सारे जगत्में प्रकाश और आनन्द बिखेर कर सांध्य वेला में अस्ताचल की ओर जाने वाले भगवान भास्कर का सौन्दर्य भी अद्भुत है। सायं-संध्या योगियों के ब्रह्म-साक्षात्कार का सोपान है। अपने-अपने इष्टदेवों-गणेश, शिव, विष्णु आदि का ध्यान भी सूर्यमण्डल में करने का शास्त्रीय विधान है।

इन्हीं कल्याणकारी भगवान् सूर्यकी कृपा का ही परिणाम है प्रस्तुत पुस्तक-भगवान् सूर्य। इसमें बारह आदित्यों के चित्ताकर्षक चित्र के साथ-साथ प्रत्येक मास के सूर्य का ध्यान, वर्ण, आयुध, व्रत-उपासना तथा लीला-कथा का सरस चित्रण है। धर्मप्राण जिज्ञासुओंके लिये इस पुस्तक में शास्त्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। यह निश्चय ही भगवान् सूर्य के बहुआयामी स्वरूप के सम्बन्ध विस्तृत जानकारी उपलब्ध करायेगा जो नयी होनेके साथ-साथ उपयोगी भी सिद्ध होगी।

 

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Geetapress Gorakhpur

Additional information
Weight 114 g
Dimensions 27 × 18.5 cm
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