Sanatan Dharmoddharah (with Hindi Commentary)

928.00

Sanatan Dharma Uddhar With the Hindi Commentary

EDITED BY PROF. VACHASPATI DWIVEDI

Ex-Head, Department of Education Sampurnanand Sanskrit Vishvavidyalaya Varanasi

जब काशी में विश्वविद्यालय के स्थापना करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था, उस समय विश्वविद्यालय का एक प्रधान उद्देश्य यह प्रकाश किया गया था कि धार्मिक तथा नीति सम्बन्धी शिक्षा देकर नवयुवकों में मानसिक बल के साथ साथ धर्मबल और चरित्रबल बढ़ाया जाय। प्रस्ताव के प्रकाश होने पर कई मित्रों ने यह पूछा कि हिन्दू जाति में कितने ही सम्प्रदाय हैं और सभी अपने अपने सम्प्रदाय के अनुसार अपना धार्मिक जीवन बनाते हैं। ऐसा कौन ग्रन्थ है जिसको पढ़ाने में सब सम्प्रदाय वालों की सम्मति हो जावेगी। मैंने यह उचित समझा कि सनातनधर्म का एक ऐसा संग्रह बनाया जाय जिसको सब सम्प्रदाय स्वीकार करें और जिसके द्वारा नवयुवकों को धर्म के सिद्धान्तों की और प्रधान उपदेशों की शिक्षा मिले।

ऐसा एक संग्रह बनाया गया और जनवरी १९०६ में प्रयाग में अखिल भारतवर्षीय सनातनधर्म के सामने कुम्भ मेले के अवसर पर प्रूफ में रक्खा गया। १९०६ के कुम्भ के अवसर पर सनातन धर्म महासभा के सभापति पूज्यपाद गोबर्धन मठ के श्रीशंकराचार्य जी थे। सभा में और भी बड़े बड़े विद्वान् और तपस्वी उपस्थित थे। एक सहस्र के लगभग संग्रह की प्रतियाँ विद्वानों के सामने रक्खी गईं। विद्वानों ने संग्रह को बहुत अच्छा माना और यह सम्मति प्रकट की कि संग्रह पूरा करके प्रकाशित किया जाय। उन विद्वानों में मेरे मित्र पण्डित उमापति द्विवेदी, उपनाम पण्डित नकछेद राम दुबे भी थे। उनकी यह सम्मति थी कि संग्रह एक निबन्ध के रूप में प्रकाशित किया जाय जिसमें पूर्वापर का सम्बन्ध हो और जिसमें सनातनधर्म के जटिल प्रश्नों का विचार भी हो।

पंडित उमापति जी इन विद्याओं के निधि थे, विशेष कर दर्शनशास्त्र के वे बड़े भारी विद्वान् थे। मैंने पंडित जी से निवेदन किया कि आप के समान दूसरा कौन विद्वान् है जिससे ऐसा ग्रन्थ लिखने को कहा जाय – आप स्वयं इस कार्य को उठाइये। पंडित जी ने ग्रन्थ का लिखना अङ्गीकार किया और बहुत परिश्रम से बहुमूल्य “सनातनधर्मोद्धार” नाम का ग्रन्थ बना दिया। पंडित उमापति जी के उत्तराधिकारियों ने यह ग्रन्थ हिन्दू विश्वविद्यालय को दे दिया है जिसके लिए हम उनके कृतज्ञ है। ग्रन्थ बड़ी प्रौढ़ संस्कृत भाषा में लिखा गया है और ग्रन्थकार ने सम्पूर्ण

ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद भी सरल और स्वच्छ भाषा में कर दिया है जिससे केवल हिन्दी जानने वालों को भी ग्रन्थ का अभिप्राय विदित हो जाय।

जो विद्वान् इस ग्रन्थ को पढ़ेंगे, उनको विदित होगा कि धर्मोउपदेश का ऐसा दूसरा ग्रन्थ दुर्लभ है। पाठशाला और विद्यालय के विद्यार्थियों को इसका ज्ञान अत्यन्त उपकारी होगा और मेरा विश्वास है कि इस ग्रन्थ के द्वारा न केवल हिन्दू युवकों को, किन्तु सर्वसाधारण में जैसे जैसे यह ग्रन्थ पढ़ा व पढ़ाया जायगा, व कथा और उपदेश के द्वारा जनता में इसके सिद्धान्तों का ज्ञान फैलेगा, उतना

ही इसके पढ़ने वालों की संख्या बढ़ेगी और पढ़नेवालों में सत्य धर्म का ज्ञान और उसमें श्रद्धा बढ़ेगी। उस समय कुण्डधार के इस कथन की सत्यता समझ में आएगी कि

पृथ्वीं रत्नपूर्णा वा महद्वा रत्नसञ्चयम् ।

भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः ॥

रत्न से भी पृथ्वी अथवा बड़ा रत्नों का ढेर मैं अपने भक्त के लिये नहीं। चाहता। मैं चाहता हूँ कि वह धार्मिक हो और नीचे लिखे दूसरे वचन की भी सत्यता का विश्वास लोगों के हृदय में जड़ पकड़ेगा

विद्या रूपं धनं शौर्य कुलीनत्वमरोगता ।

राज्यं स्वर्गश्च मोक्षश्च

सर्व धर्मादवाप्यते ॥

अर्थात् विद्या, रूप, धन, वीरता, कुलीनता, निरोगपन, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष, यह सब धर्म से प्राप्त होता है। इसीलिये महाभारत और पुराण पुकार पुकार कर यह कहते हैं कि “यतो धर्मस्ततो जयः “- जहाँ धर्म है वहाँ जय है ।

यह ग्रन्थ सनातनधर्म के ज्ञान का उत्तम प्रदीपक है। सब सभा, पाठशाला और विद्यालय के अधिकारियों को चाहिये कि इसकी एक एक प्रति अपने पाठशाला या विद्यालय और सभा में रक्खें और इसके द्वारा अपनी अपनी संस्थाओं में सनातनधर्म के उपदेशों का प्रचार करें। जिस परमात्मा के अनुग्रह से यह ग्रन्थ बनाया गया है, उसी से प्रार्थना है कि इसके द्वारा सनातनधर्म के लोकोपकारी सिद्धान्तों का सारे देश में प्रचार हो और समस्त जगत का हित हो।

मदनमोहन मालवीय

GANGANATHAJHA-GRANTHAMĀLĀ [Vol. 35]

PANDITA ŚRI UMAPATI DWIVEDI’S

SANATANADHARMODDHĀRAḤ [PART ONE ]

CHIEF-EDITOR PROF. HARERAM TRIPATHI VICE-CHANCELLOR

EDITED BY PROF. VACHASPATI DWIVEDI

Ex-Head, Department of Education Sampurnanand Sanskrit Vishvavidyalaya Varanasi

गङ्गानाथझा-ग्रन्थमाला [ ३५ ]

श्रीमन्महर्षिगौतमवंशोत्पन्नसरयूपारीणपण्डितेन श्रीकाशीवासिना उमापतिद्विवेदिना विरचितः

सनातनधर्मोद्धारः भाषाभावप्रभाटीकासमेतः प्रथमः खण्डः

कुलपतेः प्रो. हरेरामत्रिपाठिमहोदयस्य पुरोवाचा विभूषितः

प्रधानसम्पादकः प्रो. हरेरामत्रिपाठी कुलपतिः सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य वाराणसी

सम्पादक: आचार्य श्रीवाचस्पतिद्विवेदी अध्यक्षचरः, शिक्षाशास्त्रविभागस्य सम्पूर्णानन्दसंस्कृतविश्वविद्यालये वाराणस्याम्

FOREWORD

The author craves leave to present of the public the following treatise which he undertook at the especial desire of the Hon’ble Pandit Madan Mohan Malviya of Allahabad six years ago. The book (Sanatan-dharmoddhar) as its name implies, seeks to awaken a real interest in the study of the ancient or eternal religion of India and to bring about its revival. An earnest attempt has been made to deal with a vast and varied range of topics connected with the essentials of Hinduism. In doing so the author lays no claim to originality. He was followed as far as possible the letter and spirit of the precepts and injunctions contained in the immortal writings of Veda Vyasa Maharshi Jaimini, Kumaril Swami, Shankar Swami and others. For ordinary students of Sanskrit lore and aspirants after spiritual knowledge, the abstruse theistic aphorisms and intellectual subtleties which abound in the works of these sages are most difficult to grasp. A close and systematic study of these texts, which alone could afford a full insight into the basal principles of the Sanatan or Vedic religion, is rarely attempted by the present-day pandits or professors in this country. Their tastes and inclination run into antiquated grooves and cannot favor a change. The number of indigenous scholars and exponents of the Shastri knowledge is thinning day by day and the old theistic ideas and spiritual conceptions are losing their hold on the popular mind. Hence to treatise aiming at resuscitation and popularisation of the religious ideals of the Hindus would come up to modern requirements, if the writer relied merely on authoritative scriptural quotations in explaining and elucidating his points. What is required in this age of growing skepticism and unbelief is to apply the test of

reasoning and logic to religious theories based on Shastri texts. The author has invariably borne this in mind and endeavored on many occasions to explain the subject-matter in hand in the form of a catechism. In venturing out lay before his countrymen the result of his lifelong study and research in the domain of Hindi religion and ethics, it is hoped that the garb in which the present work is offered will be acceptable and convenient to the general public. For students and lovers of Sanskrit, the book written up as it is in plain Sanskrit prose would be interesting and congenial reading, whereas a free Hindi version appended to the original texts would enhance their value to those who do not possess a knowledge of Sanskrit. It is intended to bring out an English rendering of the work also at some future date.

The book from it very nature extends into large dimensions and it to be published in four volumes, each covering more or less four hundred pages of printed matter. Part I is here with presented to the public in the confident hope that its contents would inspire in the average reader an intelligent interest in and respect for the religion of his ancestors and afford him a foretaste of what is to follow in the succeeding volumes. A comprehensive Index of contents both in English and Hindi has been attached to the first volume to indicate the nature and range of topics comprised in the whole treatise.

It has been suggested that some of the most important social problems of the day viz, caste restrictions and caste exclusivism, foreign travel and sea-crossing, child marriage and remarriage of widows, falling within the purview of a work like this, might well have found a place in it. The author is afraid that such social questions would have imported an element of acrimonious controversy into purely religious issues and marred the harmony of a book that shuns sectarian

methods. These are however subjects that deserve a full and careful consideration from a Shastri standpoint and the author has a mind to bring out separate pamphlets dealing with these problems if his declining age and health should permit of his bestowing the requisite time and labor on the task.

Umapati Dwivedi

Benares : May, 1912

alias Pandit Nakchhed Ram Dube, Misra-Pokhara Benares City.

 

Brand

Sampurnanand Sanskrit University

Weight 1005 g
Dimensions 25 × 17 × 4 cm
Years

1944-45 to 1953-54, 1954-55 to 1963-64, 1964-65 to 1973-74, 1974-75 to 1983-84, 1984-85 to 1993-94, 1994-95 to 2003-04, 2004-05 to 2013-14

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Sanatan Dharmoddharah (with Hindi Commentary)”
Review now to get coupon!

Your email address will not be published. Required fields are marked *

4 × 2 =